मानसून 2026 पर अल-नीनो की आहट, कमजोर बारिश से कृषि और अर्थव्यवस्था पर बढ़ी चिंता

वर्ष 2026 में प्रशांत महासागर में विकसित हो रही अल-नीनो (El Niño) की परिस्थितियों ने भारतीय मानसून को लेकर चिंता बढ़ा दी है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार यदि अल-नीनो और मजबूत होता है, तो दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है। इसका असर कृषि, खाद्य महंगाई, ऊर्जा क्षेत्र और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून की स्थिति केवल अल-नीनो पर निर्भर नहीं करती, बल्कि भारतीय महासागर द्विध्रुव (IOD), मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) और अन्य जलवायु कारक भी अहम भूमिका निभाते हैं। मौसम एजेंसियों के अनुसार अप्रैल 2026 से प्रशांत महासागर का तापमान लगातार सामान्य से अधिक बना हुआ है। मई-जुलाई 2026 के दौरान अल-नीनो विकसित होने की संभावना 98 प्रतिशत तक पहुंच गई है। वहीं, जून के शुरुआती आंकड़ों में नीनो-3.4 और नीनो-1+2 क्षेत्रों में समुद्री सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक दर्ज किया गया है। इसके साथ ही IOD के नकारात्मक रहने से अल-नीनो के प्रभाव के कम होने की संभावना भी फिलहाल कमजोर दिखाई दे रही है। यदि मानसून कमजोर रहता है, तो धान, सोयाबीन, कपास और दाल जैसी खरीफ फसलों की बुवाई और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। बारिश की कमी से सिंचाई लागत बढ़ेगी और भूजल पर निर्भरता भी बढ़ सकती है। कम उत्पादन के कारण खाद्यान्न और सब्जियों की कीमतों में बढ़ोतरी होने से खाद्य महंगाई बढ़ने का जोखिम रहेगा। महंगाई बढ़ने की स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरों पर निर्णय लेना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है, जिससे आर्थिक वृद्धि पर दबाव पड़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि सूखा-रोधी फसलों को बढ़ावा देना, जल संरक्षण, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई का विस्तार, पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन और किसानों तक समय पर मौसम संबंधी जानकारी पहुंचाना इस चुनौती से निपटने के लिए जरूरी होगा। निष्कर्ष: फिलहाल मौसम वैज्ञानिक अल-नीनो की गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। यदि यह प्रणाली और मजबूत होती है, तो मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है। हालांकि समय पर मौसम पूर्वानुमान, प्रभावी सरकारी तैयारियों और बेहतर जल प्रबंधन से संभावित नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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