कमजोर मानसून की मार: खरीफ फसलों पर संकट, किसानों की आय और खाद्य महंगाई पर बढ़ सकता है दबाव
इस साल मानसून किसानों के लिए चिंता बढ़ाने वाला साबित हो सकता है। निजी मौसम पूर्वानुमान एजेंसी स्काईमेट वेदर ने दक्षिण-पश्चिम मानसून के अपने अनुमान को घटाकर दीर्घकालिक औसत (LPA) का 85% कर दिया है। एजेंसी ने देश में सूखा पड़ने की 70% संभावना जताई है। अप्रैल में स्काईमेट ने मानसून के 94% LPA रहने का अनुमान लगाया था। स्काईमेट के मुताबिक अल नीनो के मजबूत होने और इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) के कमजोर रहने से मानसून के आखिरी चरण में बारिश की कमी और बढ़ सकती है। अगस्त में बारिश सामान्य से करीब 16% और सितंबर में लगभग 20% कम रहने का अनुमान है। 17 अगस्त तक देश में कुल मानसूनी बारिश LPA से 13% कम रही है। 1 जून से 17 अगस्त के बीच भारत में करीब 518.7 मिमी बारिश हुई, जबकि इस अवधि में सामान्य बारिश 596.2 मिमी होती है। किसानों के लिए सबसे बड़ी चिंता क्या है? कम बारिश का सीधा असर खेतों में मिट्टी की नमी पर पड़ता है। खरीफ फसलों के लिए अगस्त और सितंबर बेहद महत्वपूर्ण महीने हैं, क्योंकि इस दौरान फसलों में वृद्धि, फूल आने और दाना बनने की प्रक्रिया चलती है। अगर इस समय पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो पौधों की बढ़वार रुक सकती है, फूल और फलियां कम बन सकती हैं तथा दाने का आकार और वजन घट सकता है। इसका सीधा असर प्रति हेक्टेयर उत्पादन पर पड़ सकता है। 1. सोयाबीन पर बढ़ सकता है संकट सोयाबीन कम बारिश से प्रभावित होने वाली प्रमुख खरीफ फसलों में शामिल है। अभी सोयाबीन में पौधों की वृद्धि और फूल आने का महत्वपूर्ण समय है। बारिश की कमी से खेतों में नमी घटने पर पौधों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है। फूल और फलियों की संख्या कम होने से प्रति एकड़ उत्पादन घटने का खतरा है। सोयाबीन की बुवाई इस साल करीब 120.84 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग 1.76 लाख हेक्टेयर कम है। यानी बुवाई क्षेत्र में कमी के साथ यदि प्रति हेक्टेयर उपज भी घटती है, तो कुल उत्पादन पर दोहरा दबाव बन सकता है। 2. मक्का की पैदावार पर असर मक्का के लिए भी पर्याप्त नमी जरूरी है। बारिश की कमी से पौधों की वृद्धि और बाद की उत्पादन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इस साल मक्के की बुवाई करीब 184.46 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले साल से लगभग 3.67 लाख हेक्टेयर कम है। यदि अगस्त-सितंबर में बारिश सामान्य से कम रहती है, तो किसानों को सिंचाई पर अधिक निर्भर होना पड़ सकता है। जिन इलाकों में सिंचाई की सुविधा सीमित है, वहां उत्पादन में गिरावट का जोखिम ज्यादा रहेगा। 3. धान पर सबसे बड़ा असर संभव धान की फसल के लिए मानसूनी बारिश का महत्व सबसे ज्यादा है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां किसान सिंचाई के लिए पूरी तरह मानसून पर निर्भर हैं। इस साल धान की बुवाई करीब 379.07 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले साल से 14.37 लाख हेक्टेयर कम है। यदि आगे भी बारिश कमजोर रहती है तो धान के खेतों में पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इससे पौधों की बढ़वार और बाद में दाना बनने की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है। नतीजतन उत्पादन घटने की आशंका बढ़ सकती है। कम बारिश का किसानों की आय पर सीधा असर कम बारिश का सबसे पहला असर उत्पादन लागत और आमदनी पर पड़ सकता है। बारिश कम होने पर किसान फसल बचाने के लिए अतिरिक्त सिंचाई कर सकते हैं। इससे डीजल, बिजली और पानी की लागत बढ़ेगी। अगर इसके बावजूद फसल की उपज कम रहती है, तो किसान का प्रति एकड़ मुनाफा काफी घट सकता है। दूसरी तरफ जिन किसानों के पास पर्याप्त सिंचाई सुविधा नहीं है, उनके लिए जोखिम और ज्यादा है। ऐसे क्षेत्रों में बारिश की कमी सीधे फसल की स्थिति को प्रभावित कर सकती है। बाजार में फसलों के दाम बढ़ने की आशंका अगर कम बारिश के कारण उत्पादन घटता है और बाजार में किसी फसल की उपलब्धता कम होती है, तो कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बन सकता है। यानी स्थिति दो तरह से किसानों को प्रभावित कर सकती है। जिन किसानों की फसल अच्छी रहती है, उन्हें कम आपूर्ति के कारण बेहतर भाव मिल सकते हैं, लेकिन जिन किसानों की उपज बारिश की कमी से खराब होती है, उनके लिए बढ़े हुए बाजार भाव भी नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएंगे। इसलिए केवल बाजार भाव बढ़ना किसानों के लिए फायदा नहीं माना जा सकता। असली सवाल यह होगा कि उपज कितनी बचती है और उत्पादन लागत कितनी बढ़ती है रबी फसलों के लिए भी खतरे की घंटी मानसून की कमजोरी का असर केवल खरीफ तक सीमित नहीं रह सकता। अगर लगातार कम बारिश के कारण मिट्टी की नमी, जलाशयों और भूजल स्तर में पर्याप्त सुधार नहीं होता है, तो इसका असर आने वाली रबी फसलों पर भी पड़ सकता है। खासकर गेहूं, चना, सरसों और अन्य रबी फसलों की बुवाई के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी महत्वपूर्ण होती है। यदि खरीफ सीजन के अंत तक जल उपलब्धता कमजोर रहती है, तो रबी की बुवाई और शुरुआती फसल विकास के लिए किसानों को अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है। इससे रबी सीजन में भी किसानों की लागत बढ़ने की आशंका रहेगी। बुवाई के आंकड़े पहले ही दे रहे हैं संकेत इस साल तीन प्रमुख फसलों में बुवाई क्षेत्र पिछले साल की तुलना में कम है: •धान: 379.07 लाख हेक्टेयर — करीब 3.65% कमी •मक्का: 184.46 लाख हेक्टेयर — करीब 1.95% कमी •सोयाबीन: 120.84 लाख हेक्टेयर — करीब 1.44% कमी इसका मतलब है कि यदि आगे बारिश में और कमी आती है तो जोखिम केवल कम बुवाई क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। कम क्षेत्रफल + कम प्रति हेक्टेयर उत्पादन का असर कुल उत्पादन पर ज्यादा बड़ा हो सकता है। किसानों के लिए आगे का समय बेहद महत्वपूर्ण अभी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बारिश की कमी को केवल पूरे देश के औसत आंकड़े से नहीं देखा जाना चाहिए। क्षेत्रवार बारिश, मिट्टी की नमी, सिंचाई की उपलब्धता और फसल की वर्तमान स्थिति तय करेगी कि वास्तविक नुकसान कितना होगा। जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, वहां किसान कम बारिश के असर को कुछ हद तक कम कर सकते हैं। लेकिन वर्षा आधारित खेती वाले इलाकों में जोखिम अधिक रहेगा। अगर अगस्त और सितंबर में मानसून कमजोर रहता है, तो इसका असर तीन स्तरों पर दिखाई दे सकता है—पहले खेत में, फिर किसान की जेब पर और उसके बाद बाजार में। खेतों में नमी की कमी से सोयाबीन, मक्का और धान की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है। उत्पादन घटने और सिंचाई लागत बढ़ने से किसानों की आय पर दबाव आ सकता है। वहीं बाजार में उपलब्धता कम होने पर कुछ कृषि जिंसों के दाम बढ़ सकते हैं, जिससे खाद्य महंगाई का खतरा पैदा होगा। सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर मानसून की कमी से जलाशयों और मिट्टी की नमी भी पर्याप्त नहीं बन पाती है, तो इसका असर अगले रबी सीजन, खासकर गेहूं की फसल तक पहुंच सकता है। इसलिए आने वाले कुछ सप्ताह खरीफ किसानों के साथ-साथ पूरे कृषि क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहने वाले हैं।