चीनी की बढ़ती कीमतों पर सरकार का बड़ा दांव, 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को मंजूरी

देश में चीनी की बढ़ती कीमतों और आगामी त्योहारी सीजन में मांग बढ़ने की आशंका के बीच केंद्र सरकार ने घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाने के लिए बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने 31 अक्टूबर 2026 तक 10 लाख टन तक कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति दी है। माना जा रहा है कि इस कदम से घरेलू बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति बढ़ेगी और कीमतों पर दबाव कम करने में मदद मिलेगी। हालांकि, सरकार के फैसले के बावजूद फिलहाल मंडियों में चीनी की तेजी थमती नजर नहीं आ रही है। कमजोर बिकवाली, स्टॉकिस्टों की सक्रिय लिवाली और मिलों की ऊंचे भाव पर बिक्री के चलते चीनी के दाम में 150-200 रुपये प्रति क्विंटल तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रिकॉर्ड ऊंचाई पर चीनी के भाव बाजार सूत्रों के मुताबिक, तेजी के बीच मिल डिलीवरी चीनी के भाव बढ़कर 5,700-5,850 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गए हैं। वहीं हाजिर बाजार में चीनी के भाव 6,100-6,200 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास बोले जा रहे हैं। मौजूदा भाव बाजार के अब तक के ऊंचे स्तरों में शामिल हैं। मुंबई बाजार में भी कमजोर बिकवाली के कारण तेजी देखने को मिली। एस-ग्रेड चीनी के भाव 5,320-5,442 रुपये से बढ़कर 5,440-5,582 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। इसी तरह एम-ग्रेड चीनी 5,420-5,572 रुपये से बढ़कर 5,550-5,682 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर पहुंच गई। तेजी के पीछे कौन-कौन से कारण? चीनी बाजार में मौजूदा तेजी के पीछे कई अहम कारण काम कर रहे हैं। बाजार में उपलब्ध स्टॉक सीमित होने के कारण बिकवाली कमजोर है। दूसरी ओर, स्टॉकिस्टों की लिवाली बढ़ने और मिलों द्वारा ऊंचे भाव पर सेल दिए जाने से कीमतों को लगातार समर्थन मिल रहा है। इसके अलावा आगामी त्योहारी सीजन में चीनी की खपत बढ़ने की उम्मीद भी बाजार की धारणा को मजबूत कर रही है। सरकार के विभिन्न उपायों के बावजूद फिलहाल बाजार में अतिरिक्त सप्लाई का पर्याप्त असर दिखाई नहीं दे रहा है। गुड़ और शक्कर के भाव भी मजबूत चीनी के साथ गुड़ और शक्कर बाजार में भी मजबूती बनी हुई है। कमजोर सप्लाई और सीमित बिकवाली के कारण गुड़ पेड़ी और चाकू के भाव 6,600-6,700 रुपये, जबकि ढैया के भाव 6,900-7,000 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास बने हुए हैं। शक्कर के भाव 6,800-7,000 रुपये प्रति क्विंटल और खांडसारी के भाव करीब 6,900-7,000 रुपये प्रति क्विंटल बताए जा रहे हैं। Ethanol Diversion भी अहम फैक्टर चीनी बाजार की दिशा तय करने में Ethanol Diversion Policy की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। सरकार की E20 नीति के तहत पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल ब्लेंडिंग की दिशा में बढ़ने के कारण गन्ने और चीनी का एक हिस्सा एथेनॉल उत्पादन की ओर डायवर्ट हो रहा है। नए सीजन में यदि एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने या चीनी का डायवर्जन बढ़ता है, तो बिक्री योग्य चीनी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं सरकार यदि घरेलू चीनी की उपलब्धता को प्राथमिकता देती है और डायवर्जन सीमित रहता है, तो बाजार में सप्लाई बेहतर हो सकती है। क्या अब चीनी की तेजी पर लगेगा ब्रेक? 10 लाख टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात का फैसला निश्चित रूप से कीमतों को नियंत्रित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इससे तत्काल बड़ी गिरावट की गारंटी नहीं मानी जा सकती। बाजार में मौजूदा तेजी केवल एक कारण पर निर्भर नहीं है। कमजोर सप्लाई, मजबूत खपत, त्योहारी मांग, ऊंचे मिल सेल भाव और स्टॉक की स्थिति जैसे कई कारक कीमतों को प्रभावित कर रहे हैं। यदि आने वाले दिनों में घरेलू उपलब्धता कमजोर रहती है, तो आयात नीति और अन्य सरकारी उपायों के बावजूद चीनी के भाव ऊंचे बने रह सकते हैं। इसके विपरीत, यदि आयात तेजी से होता है, मिलों की बिक्री बढ़ती है और बाजार में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध रहता है, तो तेजी पर दबाव बन सकता है। आगे बाजार की दिशा किस पर निर्भर करेगी? अब चीनी बाजार के लिए सबसे महत्वपूर्ण संकेत ड्यूटी-फ्री आयात की वास्तविक गति, घरेलू मिलों की बिक्री और त्योहारी मांग से मिलेंगे। यदि 10 लाख टन कच्ची चीनी की आवक समय पर होती है और रिफाइनरियों के जरिए तैयार चीनी की अतिरिक्त सप्लाई बाजार में पहुंचती है, तो मौजूदा तेजी पर ब्रेक लग सकता है। लेकिन यदि आयातित चीनी की आवक में देरी होती है और त्योहारी मांग के मुकाबले घरेलू सप्लाई कमजोर रहती है, तो निकट अवधि में कीमतें ऊंचे स्तरों पर बनी रह सकती हैं। निष्कर्ष: सरकार ने चीनी की बढ़ती कीमतों और त्योहारी सीजन की संभावित महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात का रास्ता खोल दिया है। फिलहाल इसका असर मंडियों में नजर नहीं आ रहा है और कमजोर बिकवाली व स्टॉकिस्टों की लिवाली के कारण चीनी में तेजी जारी है। आने वाले दिनों में बाजार की असली दिशा आयातित चीनी की आवक और त्योहारी मांग के बीच संतुलन से तय होगी।

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